वरुणा और असि दो नदियों के मेल से बना है वाराणसी |

वाराणसी यह दो नदियां है जो दो दिशाओं से आकर गंगा में समाहित हो जाती हैं। वाराणसी एक ऐसी नगरी जहां दूर-दूर तक गंगा की उच्छल धाराएं मोहित करती हैं तो गंगा की उन्मत्त धाराओं पर बहता मन मस्तिष्क बावरा हो जाता है। कवि की कविताओं का गढ़, साहित्यकार की रचनाओं का गढ़, राजाओं की विलासिता का गढ़, परंपराओं की पराकाष्ठा का गढ़, वाराणसी अपने कल में भी उतना ही समाहित है जितना आज में।

जब भोर की खनक होती है और मद्धम मद्धम कल कल गंगा की गुनगुनाती धारा से निकल आत्मा शिव की गंभीर हम् हम् करती ध्वनि का एहसास करती हुई काशी विश्वनाथ मंदिर की ओर बढ़ती है तो ऐसा लगता है मानों परमात्मा साक्षात उनका स्वागत कर रहे हो। हर फूल हर श्रृंगार खिलखिला उठता है। अगर उस खनक को महसूस करना है तो आइए प्रभात बेला में मधुर घंटी ध्वनि के बीच दशाश्वमेध घाट पर स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर में आपका स्वागत है।

जहां पार्वती की घर की इच्छा पूरी करने को महादेव कैलाश छोड़ आ बसे वह काशी पार्वती का घर संसार कभी किसी को खाली हाथ भेज सकता है भला!

यूं तो वाराणसी में देखने को बहुत कुछ है। नया पुराना विश्वनाथ मंदिर, हनुमान मंदिर, दशाअश्वमेघ घाट, मणिकर्णिका घाट, गंगा आरती, थोड़ा हटकर सारनाथ मंदिर, विश्वनाथ मंदिर से सटे अन्नपूर्णा मंदिर आदि अनेक मंदिर लेकिन सच मानिए जो हृदय एक बार विश्वनाथ के घर हो आए वह फिर और कहीं हिलना नहीं चाहता।

कहते हैं मणिकर्णिका घाट पर अगर अंतिम क्रिया कर्म हो तो मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। तो ऐसा धाम जो जीवन ही नहीं मृत्यु की भी गारंटी ले रहा है। जहां मृत्यु के इंतजार में गरीब से लेकर अमीर राजा से लेकर रंक तक डेरा जमाए बैठे हैं। कि यह धाम जन्म मरण के फेरे से पार लगा ही देगा। क्या इसे देखने का मोह कोई त्याग सकता है?

वाराणसी जहां तुलसीदास ने रामचरितमानस लिखा ,बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश दिया जहां प्रेमचंद जयशंकर प्रसाद निराला जैसे साहित्यकारों ने अपना योगदान साहित्य को दिया।

बनारस की साड़ी ,बनारस का पान, नवाबों की ठाठ ,मौलवियों की शान, बौद्धों का ज्ञान और जैनों की पहचान यह है वाराणसी ।एक शहर अनूठा सा, एक शहर अद्भुत जो कल भी रोशन था, आज भी है और भविष्य भी उसका कुछ अहित नहीं कर पाएगा।