एक ऐसी कला जिसे न सहेजने का मोह होता है न रखने का झंझट न बिकने का शौक न बेचने की चिंता।

रेत की कला ‘सेंड आर्ट ‘ जो कितने पल तक ठहरेगा यह लहरों के भरोसे होता है। बनाने वाले को यदि यह मोह हो जाए कि इतनी मेहनत किस काम की जो कुछ घंटों या पलों में नष्ट हो जाएगी तो वह मेहनत ही ना करें। यह है निर्मोह की कला! घंटों की मेहनत सालों की लगन और पल भर का तूफान फिर भी इस कला को जीने वाले में कोई अफसोस नहीं। इसी कला को साधने वाले कमाल के हुनरमंद इंसान हैं उड़ीसा के सुदर्शन पटनायक।

15 अप्रैल 1977 को पुरी में जन्मे सुदर्शन ने रेत कला की कोई शिक्षा नहीं ली। मुफलिसी में फंसे सुदर्शन 7 साल की उम्र में किसी के घर काम करते थे और खाली समय में समुद्र तट पर आकर रेत से खेलते थे। बचपन से चित्रकला के शौकीन सुदर्शन को उनकी लगन पूरी करने को रंग और कैनवास जब नहीं उपलब्ध हो पाए तो वह रेत को कैनवास बना। उंगलियों को ब्रश की तरह चलाना सीखने लगे। यहीं से जन्म लिया एक शानदार रेत कलाकार ने।

कला किसी बंधन की मोहताज नहीं होती, वह स्वच्छंद होती है और अपना रास्ता स्वयं ढूंढ लेती है। सुदर्शन की कला भी धीरे-धीरे निखरती गई और फिर एक समय ऐसा भी आया जब लोग उन्हें देखने लगे, फिर पसंद करने लगे। अमूमन हर छोटे-बड़े विषयों पर अपनी कलाकृति बना चुके सुदर्शन ने पुरी समुद्र तट पर सबसे ऊंचे सैंड कैसल के लिए गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज करवाया है।

सुदर्शन अभी तक 60 से भी ज्यादा अंतरराष्ट्रीय रेत मूर्तिकला प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हैं जिनमें 27 से भी ज्यादा में उन्हें पुरस्कार प्राप्त हुआ है। पुरी में ओपन एयर इंस्टिट्यूट के माध्यम से कलाकारों को रेत कला का प्रशिक्षण प्रदान कर रहे सुदर्शन की सैंड आर्ट के संबंध में एक पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है।

अपनी भिन्न-भिन्न कलाकृतियों से सभी को मोहित करने वाले सुदर्शन पटनायक अभी तक हर ज्वलंत मुद्दे को अपनी कलाकृति का विषय बना चुके हैं। कभी शिव तो कभी विवेकानंद कभी वूमेंस डे तो कभी रथ यात्रा। सभी विषयों पर उनकी कला अपना अभूतपूर्व जादू बिखेर चुकी है।

अभी फिलहाल कोरोना वॉरियर्स के सम्मान में रेत कला का प्रदर्शन कर रहे सुदर्शन ने वंदे उत्कल जननी पर कलाकृति बनाई थी जो उड़ीसा के कोरोना वॉरियर्स को समर्पित थी।

अभी तक 10 से भी अधिक बार लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में अपना नाम दर्ज करा चुके सुदर्शन को अपने देश से अधिक सम्मान विदेशों में मिला है। अमेरिका से लेकर रूस तक सभी इन्हें इनकी कलाकृतियों के लिए सम्मानित कर चुके हैं। उड़ीसा के इस मृदु तथा अल्प भाषी कला पथिक को देश का अभिनंदन।