लंका का गौरव – ब्रह्मा का प्रपौत्र – रावण। क्या यह सामान्य मनुष्य था?
रक्ष-वंशज, अधर्म अन्याय और विद्रोह का सूचक रावण, जिसने पूरी पृथ्वी को विकल विह्वल कर, स्वयं विष्णु को शरीर धारण करने हेतु विवश कर दिया – वह दशानन रावण – एक सामान्य नर तो हो ही नहीं सकता।

धर्म परायणा माता – राक्षस राज माल्यवान की पुत्री – ‘कैकसी’ और ब्रह्मा के मानस पुत्र पुलस्त्य के पुत्र ‘विश्रवा’ के पुत्र – दशानन ने एक कथा के अनुसार, ऐसे भयंकर रुदन के साथ जन्म लिया कि दिशाएं कंपित हो गईं और काल क्रमेण यह ‘रावण’ नाम से सुशोभित हुआ। अपनी धमनियों में ब्राह्मण और राक्षस दोनों रक्त लिए पैदा होने वाला ‘दशग्रीव’ कुछ विशेष था। अपने शेष सभी भाई बहनों से अतुलनीय बल और विद्वता रखने वाला – दशानन – क्या सिर्फ एक ही कुकर्म – जगद्माता सीता के अपहरण की बलिवेदी पर ही चढ़ा?

नहीं! अपना पूरा जीवन अन्याय – अधर्म एवं पीड़ितों के आंसुओं से सनी विलासिता में व्यतीत करने वाला रावण, वास्तव में सीता-रूपी आखिरी बूंद के भार तले ही दबा। अपने बड़े भाई कुबेर से सत्ता छीनने वाला – पुष्पक विमान हथियाने वाला – दशग्रीव सब कुछ उसी प्रकार छोटे भाई विभीषण के हेतु छोड़कर चला गया… वह पुष्पक विमान जो मन के सोचने की गति से चलता था… और कुबेर की संपत्ति था… उसे छीनने वाला रावण… पूरे जीवन राक्षस रीति-नीति और मर्यादा का पालन करने वाला यह दशानन, अपने कर्म से एक राक्षस ही था प्रतीत होता है।

अपने भाई कुंभकरण एवं पुत्र मेघनाथ सहित सात महाबल शाली और ओजस्वी पुत्रों को अपनी कामना तथा अहं की यज्ञ-वेदी में भस्म करने वाला यह रावण एक स्वार्थी राक्षस ही दिखता है। पर, जिसे स्वयं भगवान राम ने महा-ज्ञानी कहा, सिर्फ एक साधारण राक्षस कैसे मान लिया जाए! अपने दश मस्तकों से सुसज्जित दशानन – ‘रावण’, जो कि स्वर्ग तक सीढियाॅ बनाने का स्वप्न लिए ही चल बसा, अपने छह मस्तकों में छह शास्त्र और बाकी चार में चारों वेदों के ज्ञान का चिन्ह स्वरूप था। रामचरितमानस में तुलसीदासजी ने लिखा है कि ‘वह’ जानता था कि स्वयं विष्णु ने ही उसके नाश के हेतु राम अवतार लिया है वरना खरदूषण और त्रिसिरा का इतनी आसानी से वध और किसी के सामर्थ्य की बात नहीं थी! अतः जानबूझ योजनाबद्ध तरीके से राम की पत्नी सीता का अपहरण उनके हाथों अपनी मृत्यु को आमंत्रण देने के लिए ही था!

ज्ञान यदि मस्तिष्क की शिराएं और कोषों में ही संकलित रहे और जरूरत के समय पर निस्पंद पढ़ा रहे तो यह ऐसा है जैसे कोई खजाने का स्वामी भिखारी बन बैठा रहे… ऐसे ही निरर्थक ज्ञान से सुसज्जित, महाज्ञानी – महाप्रतापी – दसग्रीव – दशानन रावण की वास्तविकता क्या थी… इसका निर्णय यूं ही दे देना शायद अनुपयुक्त हो… एवं जनमत पर स्वयं को आरोपित करने जैसा हो… इसलिए आपके व्यक्तिगत निर्णय पर ही छोड़ देना श्रेयस्कर होगा…