मिथिला पेंटिंग, जिसे मधुबनी पेंटिंग के नाम से भी जाना जाता है, नेपाल के साथ ही बिहार में भी काफी प्रचलित है। इसे बनाने में पिगमेंट और प्राकृतिक रंगों का प्रयोग न सिर्फ ब्रश और निब वाली कलम से किया जाता है, बल्कि हाथ की उंगलियों के अलावा माचिस की तीली का भी इस्तेमाल किया जाता है। माना जाता है कि इस चित्रकारी का आगाज मिथिला नरेश राजा जनक के शासन काल में हुआ था।

जब भगवान राम सीता से शादी के लिए जनकपुर पधारे थे, तो उस समय यहां की महिलाओं ने दीवार पर इस कला को प्रदर्शित किया था। मिथिला चित्रकला के बारे में बाहरी दुनिया को पहली बार पता तब चला, जब 1934 में बिहार में बड़े पैमाने पर भूकंप आया।

इस समय जब यहां के घरों की दीवारें ढह गई, मधुबनी जिले के ब्रिटिश औपनिवेशिक अधिकारी विलियम जी आर्चर ने क्षतिग्रस्त घरों का निरीक्षण किया। उसने जब यहां की दीवारों पर बनी हुई अनेक कलाकृतियों को देखा, तो दंग रह गया और इस कलाकृति की तुलना लंदन के विक्टोरिया और अल्बर्ट संग्रहालय में मौजूद क्ली मीरो और पिकासो जैसे आधुनिक पश्चिमी कला से कर दी।

कहा जाता है कि पहले ऊंची जाति की यानी ब्राह्मण कुल की औरतों को ही इस कला को बनाने की इजाजत थी, लेकिन बदलते समय के साथ यह बंधन खत्म हो गया। आज स्थिति यह है कि मिथिला का शायद ही कोई ऐसा गांव हो, जहां की महिलाएं इस तरह की पेंटिंग नहीं करती हों। पहले जहां यह सिर्फ घर की दीवारों तक सीमित थीं, अब यह कागज, कैनवास से लेकर कपड़ों तक पर छा गया है। मूल रूप से देखा जाए तो इन चित्रों में कमल के पौधे, बांस, मछली, पक्षी और सांप जैसे चित्र अंकित किए जाते थे और इनमें प्रजनन और जीवन का विस्तार दिखाया जाता था।

इस तरह की पेंटिंग में चटख रंग गहरा लाल, हरा, नीला, काला का इस्तेमाल किया जाता है, साथ ही कुछ हल्के रंग भी इस्तेमाल में लाए जाते हैं। हल्के रंग में जैसे पीला, गुलाबी और नींबू रंग। इन रंगों का निर्माण घरेलू समानों से ही बनाया जाता था, जैसे- हल्दी, केला का पत्ता, लाल रंग के लिए पीपल की छाल का प्रयोग किया जाता था।

प्राचीन महाकाव्य के दृश्य के साथ ही सूर्य, चंद्रमा और धार्मिक पौधों के साथ ही देवी-देवताओं को दर्शाया जाता है। आम तौर पर जब इस तरह की पेंटिंग की जाती है, तो इस बात का खास ख्याल रखा जाता है कि कहीं खाली जगह न रह जाए। अगर खाली जगह है, तो वहां पेड़-पौधे, पशु-पक्षी तक का चित्र बना दिया जाता है, जो इस पेंटिग में न सिर्फ जान डाल देता है, बल्कि आकर्षक भी बनाता है।

बदलते समय के साथ इस चित्रकारी में भी बदलाव आता गया। अब इस पेंटिंग का प्रचार-प्रसार इतना हुआ कि आज यह देश से लेकर विदेशों तक में मशहूर हो गया। बताया जाता है कि 1960 में जब यहां फिर प्राकृतिक आपदा आई, इससे मधुबनी के गांव बिलकुल आर्थिक रूप से कमजोर हो गए। अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड ने मधुबनी के चारों ओर के गांवों में महिलाओं की आय बनाने के लिए परियोजना के रूप में अपनी परंपरागत दीवार चित्रों को पेपर में स्थानांतरित करने के लिए प्रोत्साहित किया। पेंटिंग्स को अखिल भारतीय हस्तशिल्प बोर्ड खरीद कर बेचती थी।

इस तरह से ये पेंटिंग मिथिला क्षेत्र के बहुत सारे बर्बाद हुए घरों के लिए आय का जरिया बन गया। 1970 के दशक के अंत तक पेंटिंग की लोकप्रिय सफलता का मुख्य कारण भारतीय चित्रकला परंपराओं से अलग हटकर चित्र का लगना था, जिसने नई दिल्ली के पेंटिंग डीलरों को खूब आकर्षित किया। रामायण के सबसे लोकप्रिय देवताओं के बड़े पैमाने पर उत्पादित चित्रों की मांग सबसे ज्यादा रही।

जब पेपर पर चित्रकारी होने लगी और ये जब ये बाजार में बिकने लगी, तब नई पारिवारिक आय पैदा करने के अलावा बहुत सारी महिलाओं ने व्यक्तिगत रूप में स्थानीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त की। कलाकारों को पूरे भारत, यूरोप, अमेरिका और जापान में प्रदर्शनियों के लिए आमंत्रित किया जाने लगा और इनके पेंटिंग्स की अच्छी कीमत भी मिलने लगी। आज के धनाढ्य लोग इस पेंटिंग को अपने बैठकखाने में लगाकर बड़े ही चाव से अपना स्टेटस दिखाने में कामयाब हो रहे हैं।