जहां समाज एक ऐसे दौर पर आकर खड़ा हो गया है कि एक तबका जो ईमानदार है, वह मुखर नहीं होना चाहता। जहां लोग बेईमानी भी यह सोचकर करते हैं कि केवल मेरे सुधरने से क्या होगा? हर इंसान जो जन्म से ही सही रास्ते पर चल रहा है वह भी थोड़ी बेईमानी और हेराफेरी को कानून के विरुद्ध नहीं मानता। सब जीवन का अंग बन गए हैं। ऐसे समय में Dr. Rajendra Prasad जैसे मुखर सटीक प्रतिभाशाली व्यक्तित्व की चर्चा स्वाभाविक है।

जमींदारी से जुड़ा इंसान जो जमीन से जुड़ा था। बड़े घर का लड़का जिसमें बड़प्पन नहीं था। सच बोलने में गुरेज नहीं और झूठ स्वीकार नहीं यह था उस व्यक्ति का संस्कार।
बहुत सारी डिग्रियां, वकालत का तमगा, घर का बेहिसाब लाड़ दुलार, क्या यह सब काफी नहीं होता है इंसान के पथ से भटकने के लिए? अहंकार उत्पन्न करने के लिए। इतिहास में बहुत से ऐसे उदाहरण दृष्टिगोचर होते हैं जहाँ लोग पद गरिमा का मान नहीं कर पाए लेकिन Dr. Rajendra Prasad इन सबसे इतर थे। ना उनमें अभिमान था ना घमंड, हाँ! स्वाभिमान कूट कूट कर भरा हुआ था। उसे यदि ठेस लगे तो वह स्वीकार नहीं करते थे। बिना स्वाभिमान के मनुष्य वैसे भी मृत प्राय हो जाता है।

जब जब देश को अपने प्रिय नेता की जरूरत हुई तब तब Dr. Rajendra Prasad अपना सर्वस्व न्यौछावर करने प्रस्तुत हो गए। जब राष्ट्रपति बनने का समय आया तो कांग्रेस के अंदर ही दो गुट हो गए। एक तबका तो इन्हें राष्ट्रपति बनाना चाहता था और दूसरा राजगोपालाचारी को यहां तक की प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अभिलाषा भी यही थी कि राजेंद्र प्रसाद नहीं राजगोपालाचारी जी राष्ट्रपति बने। इसके लिए उन्होंने प्रयास भी किया, लेकिन सफल ना हो सके। क्योंकि उनका सामना एक ऐसे व्यक्ति से था जो स्वयं के लिए नहीं राष्ट्र हित के लिए यह जानकर कि अधिकांश लोगों का भरोसा है, मुझ पर राष्ट्रपति बने।

अपने कार्यकाल में भी कभी उन्होंने केवल मूकदर्शक की भूमिका नहीं निभाई बल्कि हर स्थान पर हर समय जो सही गलत हो उसकी विवेचना की और राष्ट्रपति के तौर पर अपनी जवाबदेही का निर्वाह किया। सबकी इच्छा का सम्मान करते हुए 26 जनवरी 1950 को संविधान की स्थापना के साथ राष्ट्रपति पद की शपथ लिए। अपनी बहन की अंतिम यात्रा को दरकिनार करते हुए।

अपने पूरे जीवन काल में राष्ट्रहित पर ध्यान देने वाले राजेंद्र प्रसाद के नाम पंजाब नेशनल बैंक का पहला खाता है जिसे अभी भी बैंक ने संभाल कर रखा है। स्वहित का परित्याग करने वाले भारत रत्न डॉ राजेंद्र प्रसाद ने राष्ट्रपति पद से हटने के बाद सदाकत आश्रम में शरण ली। कोई बंगला नहीं, कोई गाड़ी नहीं, कोई प्रॉपर्टी नहीं। प्रथम राष्ट्रपति ने अपनी आखिरी सांस ली एक आम इंसान की तरह सदाकत आश्रम में।

बनावटीपन ओढ़ चुका यह समाज जहां कोई किसी का सगा नहीं पता नहीं मृत प्राय नैतिकता, ईमानदारी और लोकहित की भावना को फिर कभी वापस पाएगा या नहीं ?