अहिल्या, अनुसुइया, सावित्री सरीखी स्त्रियों की कतार में खड़ी सीता – राजर्षि जनक की पुत्री सीता – एक वर्ष तक रावण की कैद एक ही वृक्ष के नीचे बैठे-बैठे बिताने वाली सीता – और पृथ्वी से ही जन्म ले, उसी में समा जाने वाली सीता – आखिर क्या थीं?

एक सती, एक योद्धा अथवा एक महामानवी

‘अद्भुत रामायण’ में यह प्रसंग मिलता है कि सीता ने हजार मस्तक वाले ‘सहस्र रावण’ का वध महा प्रलयंकारी काली रूप धारण कर किया। बाल्मीकि रामायण अथवा तुलसीदास रचित रामचरितमानस हमें सीता की वह तस्वीर दिखाता है जिसमें वह पुरुष प्रधान समाज में आदर्श स्त्री का दर्पण स्वरूप दिखती हैं।

अब सवाल यह उठता है कि बचपन में ही खेल-खेल में शिव धनुष – वह धनुष जो उस समय पृथ्वी पर राम के अतिरिक्त कोई उठाना तो दूर हिला भी नहीं सकता था – उठा लेने वाली सीता, क्या सचमुच पुरुष परछाई मात्र ही थीं। इतने अतुलनीय बल की स्वामिनी और राज ऋषि जनक – जिनके जैसा ऋषि स्वरूप राजा कोई भी नहीं हुआ – उनकी पुत्री सीता एक दुर्बल व्यक्तित्व की कैसे हो सकती हैं ?

महाभारत के द्रोणपुत्र अश्वत्थामा का सच

आज ‘अमीश’ उन्हें योद्धा बता रहे हैं, पर क्या उनका पूरा व्यक्तित्व एक बस ‘योद्धा’ शब्द से परिभाषित हो सकता है ? हममें से कितने हैं जो एक पेड़ के नीचे लगातार दस दिन काट सकते हैं ? उन्होंने तो एक साल सर्दी, गर्मी, भीषण बरसात सब एक पेड़ के नीचे काट डाला। क्या यह एक योद्धा कर सकता है ? योद्धा युद्ध लड़ेगा। लड़ कर मारेगा या मरेगा। यह तो एक महात्मा, एक साधू, अथवा साध्वी की ही करनी हो सकती है।

अग्नि परीक्षा हो या एकांतवास, जीवन में सब कुछ एक ही भाव से स्वीकार करना एक उत्तम चरित्र के उदाहरण हैं। अपने पुत्रों को पृथक ही जन्म देना, उच्च संस्कारों से सुसज्जित करना हो या मिथिला की राजकुमारी – अयोध्या की महारानी बनना… हर क्षण एक ही स्वीकार्यता में रहना…. उनकी एक उच्च कोटि की साध्वी या, जस पिता – तस पुत्री के कथन की पुष्टि करता है।

पति-परित्यक्ता होने के बावजूद, अपनी संतानों को जीवन देने वाली माता – सीता – इतने युगों पूर्व मिथिला में स्वच्छंद विचरने वाली सीता – आज तक इतने लेखकों की कलम से गुजर कर हमारे पास आई हैं कि लक्ष्मी अवतार इस देवी की वास्तविक स्वरूप की कल्पना और रचना उतना ही मुश्किल है जैसे कि बीसियों चादर ओढ़ सूरज को देखने की कोशिश करना।

हां! जो बात पक्की है, वह यह कि सीता एक ऐसी साध्वी थीं जो अपने कर्म से सती और मन से योद्धा थीं। एक युद्ध सरीखा जीवन सती स्वरूप जीते हुए महामानवी बनकर इस धरा को त्याग गईं – धैर्य रूपी… पृथ्वी की पुत्री सीता… पृथ्वी में ही समा गईं…उन महामानवी – महादेवी सीता को हम सबका नमन |