राजस्थान की बात हो और चित्तौड़गढ़ का नाम ना आए ऐसा नहीं हो सकता। राजपूताने की शान है चित्तौड़गढ़।
चित्तौड़गढ़ से जुड़ा हुआ है, भारत का एक समृद्ध इतिहास।एक से बढ़कर एक योद्धा, एक से बढ़कर एक वीरांगनाएँ और एक से बढ़कर एक दर्शनीय स्थल ,यही है चित्तौड़गढ़ की पहचान। महाराणा प्रताप का शौर्य, राणा कुंभा, उदय सिंह, रत्नसिंह, राणा सांगा जैसे राजा महाराजा तो एक ओर रानी पद्मावती,रानी कर्णावती जैसी रानियां और वीरांगनाओं का जौहर। ऐसा बलिदान और अमर इतिहास शौर्य गाथा विश्व में कहीं और दुर्लभ है।

यह शूरवीरों का शहर पहाड़ पर बने दुर्ग के लिए प्रसिद्ध है।यह दुर्ग कितना प्राचीन है, तथा इसका निर्माण किसने करवाया इस विषय में अभी भी संशय है।ऐसा मानते हैं कि इसका निर्माण महाभारत काल में हुआ था पांच पांडवों में एक सबसे शक्तिशाली भीम ने इसे करीब ईस्वी से 5000 वर्ष पूर्व बनाया था। भीम ने अमरत्व के रहस्य को समझने के लिए इस स्थल का दौरा किया और एक योगी को अपना गुरु बनाया। योगी निर्भयनाथ और उनके साथ यति कुकड़ेश्वर। योगी ने शर्त रखी की यदि रातो रात इस स्थान पर दुर्ग का निर्माण कर दो तो तुम्हें ज्ञान दान करूं।

भीम ने शर्त मान ली और रातों-रात दुर्ग का निर्माण कर दिया। अभी रात बितने में एक पहर बाकी था, और दुर्ग का दक्षिणी हिस्सा भी, तभी यति कुकड़ेश्वर ने मुर्गे की आवाज़ में बांग लगा दी, जिसे सुनकर गुस्से में भीम ने जमीन पर एक लात जोर से पटका जिससे वहां एक बड़ा सा गड्ढा बन गया, जो आज भीमताल के नाम से प्रसिद्ध है। जहाँ भीम ने घुटने टेके वह भीम घोड़ी, तथा जिस तालाब पर यति ने मुर्गे की बांग की थी वह कुकड़ेश्वर कहलाता है। मुर्गे की आवाज निकालने के कारण उनका नाम कुकड़ेश्वर पड़ा।

इतिहासकारों के अनुसार इस किले का निर्माण मौर्यवंशी राजा चित्रांगद मौर्य ने सातवीं शताब्दी में करवाया था। शुरुआत में चित्रकूट नाम दिया था इस स्थान को चित्रांगद मौर्य ने, तथा इसी नाम से सिक्के भी जारी किए थे। बाद में यह चित्तौड़ कहा जाने लगा। अंतिम मौर्य शासक को हराकर बप्पा रावल ने इस पर अधिकार कर लिया। अनेकों युद्ध, राजनीतिक उठापटकों, का गवाह रहा है यह दुर्ग।

सन 1330 इसवी में यहां रावल रत्न सिंह की अलाउद्दीन खिलजी से लड़ाई हुई। यह लड़ाई इतिहास में प्रथम शाका के नाम से प्रसिद्ध है। सन 1538 में चित्तौड़ पर गुजरात के बहादुरशाह ने आक्रमण किया इसे मेवाड़ का दूसरा शाका कहते हैं। सन 1567 में मेवाड़ का तीसरा शाका हुआ, जिसमें अकबर ने चित्तौड़ पर चढ़ाई की थी। इन्हीं आक्रमणों को देखते हुए चित्तौड़ दुर्ग को असुरक्षित मान कर, राजा उदय सिंह ने नई और सुरक्षित राजधानी के रूप में उदयपुर का निर्माण किया।

यह स्थान जैनों का भी प्रसिद्ध तीर्थ है। यहां महावीर स्वामी का मंदिर, जैन कीर्ति स्तंभ, के साथ-साथ विजय स्तंभ, कालिका माता मंदिर, मीरा बाई का मंदिर, गौमुख कुंड, रानी पद्मिनी का महल, सूरजकुंड आदि अनेक दर्शनीय स्थल मौजूद हैं।

महाराणा कुंभा जी जो की मेवाड़ के एक अत्यंत तेजस्वी राजे हुए हैं। उन्होंने तेरहवीं शताब्दी में निर्मित अनेक महलों का जीर्णोद्धार करवाया। कीर्ति स्तंभ, विजय स्तंभ आदि अनेक महल तथा मंदिर इन्हीं के द्वारा बनवाए गए हैं। राणा कुंभा एक वीर योद्धा ही नहीं कलाप्रेमी, रचनाकार भी थे।

चित्तौड़गढ़ की महान रक्त रंजित मिट्टी तीन तीन जौहरों का प्रमाण रही है। इसी मिट्टी में मीराबाई की साधना भी फलीभूत हुई थी। अपने श्याम जी की आराधना में यही तल्लीन रहती थी मीराबाई। यहां उनके गुरु रैदास के चरण चिन्ह अंकित हैं।
समूचे भारत के सम्मुख शौर्य, देशभक्ति एवं बलिदान का अनूठा उदाहरण है यह वीरभूमि चित्तौड़गढ़। जहां असंख्य वीर राजपूत अपने देश तथा धर्म की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दिए। जहाँ अपनी निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर महाराणा कुंभा के नेतृत्व में राजपूतों ने हिंदू और हिंदुस्तान की स्थापना के लिए युद्ध किया। अपने सर्वस्व का बलिदान कर देने वाले यह विलक्षण वीर, एक से बढ़कर एक सूरमा, जिनका वर्णन करना असंभव है।

राजपूत वीरांगनाएं जो अपने सतीत्व की रक्षा के लिए अपने बाल बच्चों सहित जौहर की अग्नि में प्रवेश कर गईं। इन स्वाभिमानी देश प्रेमी योद्धाओं से भरी पड़ी यह भूमि पूरे देश के लिए प्रेरणा स्रोत तथा दर्शनीय स्थल है। इनका कर्ज तो हम कभी नहीं उतार सकते लेकिन इन वीरों की भूमि पर यदि इन्हें जाकर नमन करें तो बहुत सुकून मिलता है। यहां का कण-कण हमारे अंदर देश प्रेम की लहर पैदा करता है।

यह चित्तौड़गढ़ दुर्ग भारत का सबसे विशाल दुर्ग है । इतिहास की सबसे अधिक खूनी लड़ाईयों का गवाह, राजस्थान का गौरव यह प्रदेश। जहां इस किले को राजस्थान के सभी दुर्गों का सिरमौर कहते हैं। 21 जून 2013 में यूनेस्को ने इसे विश्व विरासत स्थल घोषित किया था।